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Body Composition 1 min read

शरीर दुबला-पतला क्यों होता है? असली कारण जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते

पतला दिखना हेल्दी होने की गारंटी नहीं है। जानें शरीर दुबला-पतला होने के असली कारण, 'Skinny Fat' का साइंस, और सिर्फ खाना बढ़ाने की बजाय क्या करना चाहिए।

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शरीर दुबला-पतला क्यों होता है? असली कारण जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते

शरीर दुबला-पतला क्यों होता है? असली कारण जो ज़्यादातर लोग नहीं जानते

“तुम तो एकदम फिट हो, कितने पतले हो!” — अगर आप दुबले-पतले शरीर वाले इंसान हैं, तो यह लाइन आपने ज़िंदगी में सैकड़ों बार सुनी होगी। परिवार में, दोस्तों के बीच, ऑफिस में — पतला दिखने को लगभग हमेशा हेल्दी होने का सर्टिफिकेट मान लिया जाता है। लेकिन सच यह है कि सिर्फ पतला दिखना इस बात की गारंटी नहीं देता कि आपकी बॉडी अंदर से भी उतनी ही हेल्दी है।

बहुत से लोग जो “दुबला-पतला शरीर” को लेकर परेशान रहते हैं, असल में दो अलग-अलग समस्याओं में उलझे होते हैं। पहली — सच में कम वज़न (underweight) होना, जहां शरीर को पर्याप्त कैलोरी और पोषण नहीं मिल रहा। दूसरी, और यह ज़्यादा छुपी हुई समस्या है — ऐसा शरीर जो देखने में पतला या नॉर्मल वज़न का लगता है, लेकिन जिसमें मसल मास बहुत कम और शरीर के अंदर छिपी चर्बी (visceral fat) ज़्यादा है। इसे साइंस की भाषा में “Skinny Fat” या TOFI — Thin Outside, Fat Inside — कहा जाता है। यही असली सवाल है जिसका जवाब सिर्फ “ज़्यादा खाओ” कहकर नहीं दिया जा सकता।

InBody Dial H20 home scale with its companion smartphone app
InBody Dial H20 home scale with its companion smartphone app

दुबला-पतला दिखना और सेहतमंद होना — दोनों में फ़र्क़ है

ज़्यादातर लोग अपनी सेहत को सिर्फ आईने में देखकर या वज़न कांटे (weighing scale) पर खड़े होकर आंकते हैं। कुछ लोग BMI (Body Mass Index) कैलकुलेट करके संतुष्ट हो जाते हैं कि उनका नंबर “नॉर्मल रेंज” में है। लेकिन BMI सिर्फ आपकी हाइट और वज़न का रिश्ता बताता है — यह यह नहीं बता सकता कि आपके शरीर का वज़न कितना मसल है और कितना फैट।

ज़रा इस उदाहरण को समझिए। मान लीजिए दो लोग हैं, दोनों की हाइट और वज़न एक जैसा है, दोनों का BMI भी बिल्कुल बराबर है:

  • व्यक्ति A: बॉडी फैट 20%, मसल मास अच्छा, विसरल फैट लेवल नॉर्मल — यह असल में हेल्दी बॉडी कॉम्पोज़िशन है
  • व्यक्ति B: बॉडी फैट 32%, मसल मास बहुत कम, विसरल फैट लेवल बढ़ा हुआ — यह “स्किनी फैट” प्रोफाइल है

दोनों का BMI एक जैसा होने के बावजूद इनकी सेहत में ज़मीन-आसमान का फ़र्क़ है। यही वजह है कि सिर्फ वज़न या BMI देखकर “मैं ठीक हूं” या “मुझे वज़न बढ़ाना है” जैसा फैसला लेना अधूरी जानकारी पर आधारित होता है। असली सवाल वज़न का नहीं, बॉडी कॉम्पोज़िशन का है — यानी शरीर के अंदर मसल, फैट और पानी का सही अनुपात।

“Skinny Fat” यानी छिपी हुई चर्बी का साइंस क्या कहता है

2004 में The Lancet जर्नल में एक बहुचर्चित स्टडी छपी थी, जिसे “YY Paradox” कहा जाता है। इसमें एक भारतीय डॉक्टर और एक यूरोपियन (कॉकेशियन) डॉक्टर की तुलना की गई — दोनों का BMI बिल्कुल बराबर, 22.3 था। लेकिन भारतीय डॉक्टर का बॉडी फैट 21.2% था, जबकि यूरोपियन डॉक्टर का सिर्फ 9.1%। यानी एक जैसा वज़न और एक जैसी हाइट होने के बावजूद, भारतीय शरीर में चर्बी का प्रतिशत दोगुने से भी ज़्यादा था। बाद की कई स्टडीज़ ने भी यही पैटर्न दिखाया है — भारतीयों में यूरोपियन आबादी के मुकाबले उसी BMI पर करीब 5 से 9% ज़्यादा विसरल फैट पाया जाता है।

इसके पीछे तीन मुख्य वजहें मानी जाती हैं:

1. जेनेटिक्स और “थ्रिफ्टी जीनोटाइप”

एक थ्योरी कहती है कि सदियों तक भारतीय उपमहाद्वीप में खाने की कमी रही, जिसकी वजह से शरीर ने कम कैलोरी में भी ज़्यादा एनर्जी स्टोर करने की आदत विकसित कर ली — इसे “थ्रिफ्टी जीनोटाइप” कहा जाता है। आज जब खाना आसानी से उपलब्ध है और शारीरिक मेहनत कम हो गई है, तो यही जेनेटिक फायदा एक नुकसान बन गया है। साथ ही, भारतीय आबादी में जन्म से ही मसल मास कम और फैट स्टोर करने की प्रवृत्ति ज़्यादा पाई जाती है — यानी एक जैसा खाना खाकर भी शरीर उसे अलग तरह से इस्तेमाल करता है।

2. डाइट पैटर्न — कैलोरी तो है, प्रोटीन नहीं

बहुत से “पतले” लोग असल में कम प्रोटीन, ज़्यादा रिफाइंड कार्ब्स (मैदा, सफेद चावल, चीनी, तला-भुना) वाली डाइट लेते हैं। इस तरह की डाइट में भले ही कैलोरी पूरी लग रही हो, लेकिन शरीर को मसल बनाने के लिए ज़रूरी प्रोटीन और अमीनो एसिड नहीं मिलते। नतीजा यह होता है कि शरीर मसल की जगह फैट स्टोर करता है — भले ही वज़न कांटे पर नंबर कम ही क्यों न दिखे।

3. फिज़िकल एक्टिविटी और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग की कमी

सिर्फ पतला होना “फिट” होने का सबूत नहीं है। बहुत से दुबले-पतले लोग कभी वेट ट्रेनिंग या रेज़िस्टेंस एक्सरसाइज़ नहीं करते। बिना स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के मसल मास अपने आप नहीं बढ़ता, बल्कि उम्र के साथ घटता ही जाता है। ऐसे में शरीर हल्का ज़रूर दिखता है, लेकिन उसके अंदर मसल की जगह फैट का अनुपात बढ़ता रहता है — यही “स्किनी फैट” बनने का सबसे बड़ा रास्ता है।

InBody Dial H40 home body composition scale in everyday use
InBody Dial H40 home body composition scale in everyday use

भारत में यह समस्या इतनी आम क्यों है

यह सिर्फ किसी एक व्यक्ति की बात नहीं, बल्कि पूरे भारत के लेवल पर दिखने वाला पैटर्न है। ICMR-INDIAB नेशनल स्टडी के मुताबिक भारत के करीब 43% वयस्क “Metabolically Obese Non-Obese” (MONO) कैटेगरी में आते हैं — यानी उनका BMI नॉर्मल है, लेकिन उनके शरीर में इंसुलिन रेज़िस्टेंस, ज़्यादा ट्राइग्लिसराइड्स या हाई ब्लड प्रेशर जैसी मेटाबॉलिक दिक्कतें पहले से मौजूद हैं। गुजरात में हुई एक स्टडी में तो यह आंकड़ा और भी चौंकाने वाला था — नॉर्मल BMI वाले करीब 45% लोगों में “थिन-फैट” प्रोफाइल पाया गया, और इनमें से आधे लोगों का फास्टिंग ब्लड शुगर पहले से बढ़ा हुआ था।

दूसरी तरफ, NFHS-5 (नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे) के आंकड़े बताते हैं कि 2019–21 में भारत में करीब 16.2% पुरुष और 18.7% महिलाएं टेक्निकल तौर पर “underweight” (BMI 18.5 से कम) थीं — यानी सच में कम वज़न वाला वर्ग भी छोटा नहीं है। इसके अलावा, InBody और Ipsos के 2020 के एक सर्वे में, जो 8 भारतीय शहरों के 1,243 लोगों पर किया गया था, पाया गया कि 30–55 साल की उम्र के करीब 71% भारतीयों का मसल मास सामान्य से कम था। यानी चाहे कोई व्यक्ति टेक्निकली underweight हो, नॉर्मल वज़न का हो या “healthy” दिखता हो — कम मसल मास और छिपी चर्बी का कॉम्बिनेशन भारत में बेहद आम है, और इसकी वजह सिर्फ खान-पान नहीं, बल्कि जेनेटिक्स, डाइट क्वालिटी और एक्टिविटी लेवल — तीनों का मेल है।

यह सिलसिला उम्र के साथ और बिगड़ता है। पश्चिम भारत में मध्यम आयु वर्ग (40+) के वयस्कों पर हुई एक स्टडी में सार्कोपीनिया (उम्र के साथ मसल लॉस) की दर करीब 10% पाई गई, जो ग्रामीण इलाकों में शहरी इलाकों के मुकाबले लगभग दोगुनी थी। सीधी भाषा में कहें तो — बिना सही डाइट और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग के, “पतला” शरीर उम्र बढ़ने के साथ धीरे-धीरे “पतला लेकिन कमज़ोर और चर्बी वाला” शरीर बनता चला जाता है।

Body Composition टेस्ट क्यों ज़रूरी है, सिर्फ वज़न कांटा क्यों नहीं

वज़न कांटा सिर्फ एक नंबर देता है — कुल वज़न। यह नहीं बताता कि वह वज़न मसल का है, फैट का है, या पानी का। BMI भी सिर्फ हाइट और वज़न का गणित है, इससे आगे कुछ नहीं। जबकि शरीर की असली सेहत समझने के लिए कम-से-कम तीन चीज़ें जानना ज़रूरी है:

  • Skeletal Muscle Mass (SMM) — शरीर में कितना असली मसल है, जो मेटाबॉलिज़्म और ताकत दोनों तय करता है
  • Percent Body Fat (PBF) — कुल वज़न में फैट का कितना हिस्सा है
  • Visceral Fat Level — शरीर के अंदरूनी अंगों (लिवर, आंतों, पैंक्रियास) के आसपास जमा चर्बी, जो सबसे ज़्यादा नुकसानदायक मानी जाती है

InBody जैसा बॉडी कॉम्पोज़िशन टेस्ट कुछ ही मिनटों में यह सारी जानकारी दे देता है — बिना किसी दर्द या इंजेक्शन के। इससे पता चलता है कि क्या आपको सच में कैलोरी और वज़न बढ़ाने की ज़रूरत है, या आपका असली मसला मसल मास बढ़ाना और फैट कम करना (यानी body recomposition) है — दो बिल्कुल अलग-अलग समाधान वाली समस्याएं, जिन्हें सिर्फ आईने में देखकर अलग नहीं किया जा सकता।

InBody Dial home body composition scale
InBody Dial home body composition scale

दुबला-पतला शरीर ठीक करने के लिए क्या करें — प्रैक्टिकल स्टेप्स

अगर आप सच में अपनी बॉडी को हेल्दी तरीके से बदलना चाहते हैं, तो सिर्फ ज़्यादा खाना समाधान नहीं है। यहां वे कदम हैं जिन्हें साइंस सपोर्ट करता है:

  1. प्रोटीन इनटेक बढ़ाएं: ज़्यादातर भारतीय डाइट में प्रोटीन की कमी होती है। शरीर के वज़न के हिसाब से रोज़ाना करीब 1.2–1.6 ग्राम प्रोटीन प्रति किलो लक्ष्य रखें — दाल, पनीर, दही, अंडे, सोया, चिकन-मछली (अगर खाते हैं) से यह पूरा किया जा सकता है।
  2. स्ट्रेंथ ट्रेनिंग शुरू करें: सिर्फ कार्डियो या वॉकिंग से मसल नहीं बनता। हफ्ते में 3–4 बार वेट ट्रेनिंग या रेज़िस्टेंस एक्सरसाइज़ (स्क्वाट, डेडलिफ्ट, पुशअप जैसी कंपाउंड मूवमेंट्स) मसल मास बढ़ाने का सबसे भरोसेमंद तरीका है।
  3. सिर्फ कैलोरी नहीं, क्वालिटी पर ध्यान दें: रिफाइंड कार्ब्स (मैदा, चीनी, तला-भुना) की जगह होल ग्रेन्स, मोटे अनाज (millets) और सब्ज़ियों को प्राथमिकता दें — इससे शरीर फैट कम स्टोर करता है और मसल बनाने के लिए बेहतर ईंधन मिलता है।
  4. नींद पूरी लें: मसल रिकवरी और ग्रोथ हार्मोन का बड़ा हिस्सा नींद के दौरान ही काम करता है। 7–8 घंटे की नींद के बिना न मसल ठीक से बनता है, न फैट कंट्रोल में रहता है।
  5. सिर्फ ज़्यादा खाने के जाल में न फंसें: बिना ट्रेनिंग के सिर्फ कैलोरी बढ़ाने से अक्सर फैट ही बढ़ता है, मसल नहीं — जिससे “पतला” शरीर आगे चलकर “स्किनी फैट” शरीर बन सकता है। खाना बढ़ाना है तो ट्रेनिंग के साथ बढ़ाएं।
  6. वज़न नहीं, बॉडी कॉम्पोज़िशन ट्रैक करें: हर 8–12 हफ्ते में एक बॉडी कॉम्पोज़िशन टेस्ट करवाएं। इससे पता चलेगा कि वज़न कांटे का नंबर भले ही धीरे बढ़ रहा हो, लेकिन क्या वह बढ़ोतरी असल में मसल की है या सिर्फ फैट की — यही असली प्रोग्रेस का पैमाना है।

अक्सर पूछे जाने वाले सवाल

शरीर पतला होने का कारण क्या है?

शरीर पतला होने के कई कारण हो सकते हैं — कम कैलोरी और प्रोटीन इनटेक, तेज़ मेटाबॉलिज़्म, जेनेटिक्स, थायरॉइड जैसी हार्मोनल दिक्कतें, पाचन से जुड़ी समस्याएं, या लगातार तनाव। लेकिन कई बार “पतला” दिखने वाला शरीर असल में सिर्फ कम कैलोरी का नहीं, बल्कि कम मसल मास और ज़्यादा छिपी चर्बी (visceral fat) का मामला होता है — जिसे सिर्फ देखकर पहचानना मुश्किल है।

दुबला-पतला शरीर कैसे ठीक करें?

सिर्फ खाना बढ़ाने की बजाय प्रोटीन इनटेक बढ़ाएं, हफ्ते में 3–4 बार स्ट्रेंथ ट्रेनिंग करें, नींद पूरी लें और रिफाइंड कार्ब्स कम करें। सबसे ज़रूरी है कि सिर्फ वज़न कांटे पर भरोसा करने की बजाय बॉडी कॉम्पोज़िशन टेस्ट करवाएं, ताकि पता चले कि आपको असल में मसल बढ़ाने की ज़रूरत है, फैट घटाने की, या दोनों की।

क्या पतला दिखने वाला व्यक्ति भी अनहेल्दी हो सकता है?

हां, बिल्कुल। इसे “Skinny Fat” या TOFI (Thin Outside, Fat Inside) कहा जाता है — जहां व्यक्ति का वज़न और BMI नॉर्मल दिखता है, लेकिन उसका बॉडी फैट प्रतिशत ज़्यादा और मसल मास कम होता है। भारत में हुई कई स्टडीज़ के मुताबिक, नॉर्मल BMI वाले करीब 40–45% लोगों में यह प्रोफाइल पाया गया है, जिससे डायबिटीज़ और दिल की बीमारी का खतरा बढ़ जाता है।

वज़न बढ़ाने के लिए सबसे ज़रूरी चीज़ क्या है?

सिर्फ ज़्यादा कैलोरी खाना काफी नहीं है। सही तरीका है — कैलोरी सरप्लस के साथ पर्याप्त प्रोटीन (करीब 1.2–1.6 ग्राम प्रति किलो शरीर का वज़न) और स्ट्रेंथ ट्रेनिंग को साथ में जोड़ना। इससे बढ़ने वाला वज़न मसल के रूप में बढ़ता है, सिर्फ फैट के रूप में नहीं — जो लंबे समय में सेहत के लिए बेहतर है।

क्या सिर्फ ज़्यादा खाने से मसल बन जाते हैं?

नहीं। मसल बनाने के लिए शरीर को एक ट्रिगर चाहिए, और वह ट्रिगर है स्ट्रेंथ ट्रेनिंग या रेज़िस्टेंस एक्सरसाइज़। बिना वर्कआउट के सिर्फ कैलोरी और प्रोटीन बढ़ाने से ज़्यादातर एक्स्ट्रा कैलोरी फैट के रूप में स्टोर होती है, मसल के रूप में नहीं। इसलिए डाइट और ट्रेनिंग — दोनों साथ चलने चाहिए।

Body Composition टेस्ट में क्या पता चलता है?

InBody जैसा बॉडी कॉम्पोज़िशन टेस्ट कुछ ही मिनटों में आपका Skeletal Muscle Mass (मसल मास), Percent Body Fat (फैट प्रतिशत), Visceral Fat Level (छिपी चर्बी का स्तर), शरीर में पानी का अनुपात, और एक ओवरऑल InBody Score बताता है। यह जानकारी सिर्फ वज़न या BMI से कहीं ज़्यादा सटीक तरीके से बताती है कि आपकी असली सेहत की स्थिति क्या है।

InBody बॉडी कॉम्पोज़िशन टेस्ट कहां करवा सकते हैं?

InBody टेस्ट भारत के प्रमुख शहरों में अस्पतालों, फिटनेस सेंटर्स और वेलनेस क्लिनिक्स में उपलब्ध है। टेस्ट में सिर्फ कुछ मिनट लगते हैं, कोई दर्द या इंजेक्शन नहीं होता, और नतीजे तुरंत मिल जाते हैं। अपने नज़दीकी टेस्ट सेंटर की जानकारी के लिए inbody.in/inbody-test.php पर विज़िट करें।

अगला कदम — सिर्फ अंदाज़ा नहीं, सही जानकारी लें

“तुम तो पतले हो, फिट हो” — यह तारीफ सुनना अच्छा लगता है, लेकिन इसके पीछे छिपी सच्चाई को नज़रअंदाज़ करना सही नहीं। दुबला-पतला दिखना और असल में हेल्दी होना, ये दोनों अलग-अलग बातें हैं। सिर्फ खाना बढ़ाकर या वज़न कांटे के नंबर का पीछा करके आप शायद सही समस्या को हल ही न कर पाएं।

असली जवाब आपके शरीर के अंदर छिपा है — कितना मसल है, कितना फैट है, और विसरल फैट का स्तर क्या है। यह सब जानने का सबसे आसान तरीका है एक भरोसेमंद बॉडी कॉम्पोज़िशन टेस्ट। अपना InBody टेस्ट बुक करने के लिए inbody.in/inbody-test.php पर जाएं — और अंदाज़े की जगह असली डेटा के आधार पर अपनी सेहत के बारे में फैसला लें।

इस विषय पर और गहराई से पढ़ने के लिए ये आर्टिकल भी देखें — “Skinny Fat” और भारत में छिपी हुई ओबेसिटी की पूरी कहानी, और BMI बनाम बॉडी कॉम्पोज़िशन — कौन सा नंबर असल में मायने रखता है

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